जर्जर भवन, गंदगी, बदबू, कीचड़ और धूल, ऐसा है पामगढ़ का कन्या मिडिल स्कूल
मुरली मनोहर शर्मा
पृथक छत्तीसगढ़/पामगढ़।
एक समय था जब शासकीय विद्यालय अपने अनुशासन, शिक्षा और नैतिक संस्कार देने के लिए जाना जाता था और उन शासकीय विद्यालयों से पढ़कर विद्यार्थी अपना लक्ष्य भी प्राप्त करते थे जिनमें से कोई डॉक्टर,वकील, इंजीनियर, शिक्षक भी बनते थे तो कोई राजनेता भी बन कर अपने क्षेत्र और समाज के साथ ही देश को गौरवान्वित करते थे। उस समय के शिक्षक भी अपने विद्यार्थियों के प्रति अपने दायित्वों का पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ निर्वहन करते थे। वे भली भाँति समझते थे कि उन्हें विद्यार्थियों के माध्यम से सभ्य समाज और सशक्त देश के निर्माण करने की जिम्मेदारी दी गयी है। उस समय शासन-प्रशासन भी शासकीय विद्यालयों सहित शिक्षकों के प्रति संवेदनशील हुआ करती थी। शिक्षकों और विद्यालयों में होने वाली गतिविधियों पर उनका पूरा नियंत्रण हुआ करता था किंतु वर्तमान परिस्थितियों में शासकीय विद्यालयों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गयी है। सूत्रों के मुताबिक अब न तो विद्यालय के भवनों में मजबूती दिखती है,न स्वच्छता,न शिक्षा,न अनुशासन और ना ही विद्यार्थियों को नैतिक संस्कार ही दिए जाते हैं। शिक्षक भी अपना कर्तव्य भूल कर ज्ञान देने के इस पुनीत कार्य को केवल नौकरी मानने लगे हैं और विद्यार्थियों को अनुशासन,शिक्षा और संस्कार देने के बजाय धनोपार्जन में लगे हुए हैं। शासन प्रशासन भी अब विद्यालय और शिक्षक के प्रति उदासीन हो चुकी है। जिसके कारण अब शासकीय विद्यालयों को लोग दाल भात केंद्र की संज्ञा देने लगे हैं। इन सभी विसंगतियों से युक्त एक शासकीय विद्यालय पामगढ़ मुख्यालय में स्थित है जो बीइओ ऑफिस के पास संचालित है। इसके बावजूद यह विद्यालय उपेक्षित सा शासन प्रशासन को लज्जित करता हुआ किसी कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की प्रतीक्षा कर रहा है कि कब वे इसकी दशा में सुधार करेंगे और कब यह विद्यालय वास्तव में विद्यालय बन पाएगा।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं ससहा रोड पामगढ़ में स्थित शासकीय कन्या मिडिल स्कूल की जहाँ पर फैली अव्यवस्था को पृथक छत्तीसगढ़ अखबार ने प्रमुखता से प्रकाशित किया था। खबर प्रकाशन के माध्यम से शासन प्रशासन को यह ज्ञात भी हो गया कि इस विद्यालय में बेटियों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और वे कैसे प्रशासन द्वारा किये जा रहे इस अन्याय को सहने के लिए मजबूर हो चुके हैं।
जर्जर भवन में न मरम्मत न पुताई,फिर भी शुरू हो गयी पढ़ाई
इस विद्यालय के भवन को देख कर अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके निर्माण में कितनी लापरवाही और भ्रष्टाचार किया गया है। जिसके चलते दीवारों में दरारें पड़ चुकी हैं और दीवार सहित छत पर भी बारिश के पानी की वजह से शीलन आ चुकी है। जो अंदर ही अंदर इस भवन को कमजोर कर रहा है। न जाने कितने ही अधिकारी निरीक्षण पर आते जाते रहें हैं लेकिन किसी ने इसकी मरम्मत सहित पुताई कराने की पहल क्यों नही की ये सोचने वाली बात है।
कूड़े कचरे का लगा अंबार,संक्रमण होने पर कौन होगा जिम्मेदार
खबर प्रकाशन के लगभग एक महीने बीत जाने के बाद भी प्रशासन ने इस विद्यालय में जमा हो चुके कूड़े कचरे सहित घासफूस आदि की सफाई नही कराई है। बारिश के मौसम में इन कचरों के ढेर पर पानी पड़ने से सड़न की दुर्गंध भी आने लगी है क्योंकि होटल की नालियों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों का जमाव भी इन्हीं कचरों के ढेर में मिलता रहा है। ऐसे में यदि इस गंदगी के चलते यहाँ पढ़ने वाली छात्राओं में किसी भी प्रकार का संक्रमण फैलता है तब इसके जिम्मेदार कौन होंगे और क्या तब जिम्मेदारों पर की जाने वाली नाटकीय कार्यवाही उन बच्चों का स्वास्थ्य वापस दिला पाएगी।
दुर्गंध के चलते 10 वर्षों से नहीं खुली खिड़कियाँ
यह बात प्रशासन के लिए कितनी शर्म की बात है की एक तरफ वह बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात करती है और दूसरी तरफ उन्हीं बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति उदासीन भी रहती है। नतीजा यह हुआ कि असहनीय दुर्गंध आने के कारण इस विद्यालय की कक्षाओं की खिड़कियां पिछले 10 वर्षों से बन्द हैं और इसी तरह अंधेरे में बेटियां पढ़ने को मजबूर हैं। फिर भी अधिकारियों को न लज्जा का अनुभव होता है और न उनकी अंतरात्मा उन्हें अपने कर्तव्य का बोध कराती है। यदि यह बात झूठ होती तो इस विद्यालय के कायाकल्प होने में अधिक समय नही लगता।
छात्राएं आज भी जमीन पर बैठने के लिए मजबूर
खबर प्रकाशित होते ही अधिकारियों ने दिखावे के लिए होटल संचालकों के माध्यम से विद्यालय अंदर की नाली को बाहर करवा दिया और कुछ टेबल बेंच की व्यवस्था भी करा दी किंतु कक्षा 6 वीं की 45 छात्राओं के लिए आज भी टेबल बेंच की व्यवस्था नही करा पाए हैं। आज भी केवल पत्राचार ही हो रहा है।सवाल यह है कि पहले जो टेबल बेंच थीं वे सब कहाँ गईं और बिना पूरी व्यवस्था के शाला प्रवेशोत्सव सहित अध्यापन कार्य प्रारंभ क्यों किया गया।
विद्यालय स्टाफ ने पत्राचार कर झाड़ लिया पल्ला
इस विद्यालय के स्टाफ सहित प्रधानपाठक ने भी उच्चाधिकारियों को इन अव्यवस्थाओं के लिए पत्राचार तो किया किंतु उच्चाधिकारियों की नाराजगी और अपनी नौकरी पर खतरा मंडराने के भय ने इन्हें भी शिक्षक के कर्तव्य और विद्यार्थियों के प्रति इनके दायित्व को भूलने पर विवश कर दिया।यदि यह बात भी सच नही है तो सोचिए जो अपने वेतन वृद्धि और संविलियन आदि के लिए प्रशासन के विरुद्ध आंदोलन कर सकते हैं तो क्या वे अपने विद्यालय और विद्यार्थियों के हित में छात्राओं सहित अभिभावकों को ले कर सड़क पर नहीं उतर सकते थे।
जनता के सेवक और जिम्मेदारों की उदासीनता से विद्यार्थी भी परेशान
सूत्र बताते हैं कि जब भी शासन द्वारा निर्माण कार्य हेतु कोई राशि स्वीकृत होती है तो उसके बाद कमीशन का खेल शुरू हो जाता है जिसके चलते स्वीकृत राशि का अधिकांश भाग तो जिम्मेदार ही निगल जाते हैं। बची खुची राशि से ही निर्माण कार्य कराया जाता है और गुणवत्ताहीन निर्माण होने के चलते है एक बरसात होते ही निर्माण कराने वालों की कलई खुल जाती है। साथ ही जिम्मेदारों को भी धनोपार्जन से ही सरोकार है तभी तो इतनी अव्यवस्था के बीच बेटियां पढ़ने को मजबूर हैं और सब कुछ जानते हुए भी जिम्मेदार कान में रुई डाले कुर्सी पर आराम फरमा रहे हैं। अब छात्राओं के मन में भी यही बात घर कर चुकी है कि उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य अब भगवान भरोसे है और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का स्लोगन एक ढोंग मात्र है। अब देखना यह है कि इन बेटियों के लिए जिम्मेदार अपनी जिम्मेदारी समझते हैं और इस विद्यालय का कायाकल्प करते है या बेटियों की पुकार को अनसुनी कर अपनी ही मनमानी करते हैं।