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एक स्कूल में 2 बच्चों को पढ़ाते हैं 3 शिक्षक, एजुकेशन सिस्टम पर खड़े हुए सवाल

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  • जिले में कई ऐसे स्कूल हैं जहां आज भी शिक्षकों की कमी है पर जिम्मेदार मौन

शेख मुबारक
पृथक छत्तीसगढ़/सक्ती।

छत्तीसगढ़ बनने के बाद से ही प्रदेश की तमाम सरकारों ने शिक्षा व्यवस्था ठीक करने के कई प्रयास किए हैं, लेकिन जिम्मेदारों की लापरवाही से धरातल पर आज भी स्थिति सरकारी काम वाली कहावत बयां कर रही है, यही वजह है कि सक्ती जिले के एक स्कूल, जहां 2 बच्चे और उनको पढ़ाने 3 शिक्षक, जिनकी प्रतिमाह करीब 2 लाख की तनख्वाह, पर जिम्मेदार कौन..?

 

सक्ती जिले में कई स्कूल आज भी शिक्षकों की भारी कमी से जूझ रहे हैं। वहीं जिले के मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम पंचायत सकर्रा में नवीन भाठापारा नाम से शासकीय प्राथमिक स्कूल संचालित है। इस स्कूल में 3 शिक्षक मिलकर 2 बच्चों को पढ़ा रहे हैं। शिक्षा की इस सरकारी ढर्रे और बदहाल स्थिति ने पूरे एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां प्राथमिक विद्यालय का भविष्य खतरे में नजर आता है। इस मामले में जिम्मेदार भी जमकर कोताही बरत रहे हैं। शायद यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा के बुरे हाल हैं।

 

मालखरौदा ब्लॉक के ग्राम पंचायत सकर्रा में नवीन भाठापारा नाम के इस शासकीय प्राथमिक स्कूल में जहां वर्तमान में दो बच्चे दर्ज हैं और इन दो बच्चों के लिए तीन शिक्षक हैं, अब इसे विडंबना कहे या लापरवाही दो बच्चों के लिए शासन हर मांह एक से डेढ़ लाख रुपए लगभग खर्च कर रहा है। सक्ति जिले में ऐसा केवल एक ही स्कूल नहीं है, बल्कि जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं, जहां की दर्ज संख्या 20 से कम है। वही कई ऐसे स्कूल भी हैं जहां शिक्षकों की कमी है जिससे बच्चों का सिलेबस साल भर में पूरा नही हो पाता है, स्कूल खुले करीब एक माह बितने को है ऐसे मे कम संख्या वाले स्कूलों के संचालन और शिक्षकों की कमी से जूझ रहे स्कूलों को लेकर शिक्षा विभाग की रीतिनीति समझ से परे है। वही जिले के अधिकारी सवाल पर उच्च अधिकारियों का मामला बता कर बचते नजर आ रहे हैं। ऐसे मे आखिर बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिल पाएगी।

 

आखिर क्यौ आई ऐसी नौबत, क्या विभागीय अधिकारी है कुंभकर्णी निद्रा में..?

गांव में बच्चे ही न हो इसलिए ऐसी नौबत आ गई हो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। क्या कही ऐसी स्थिति शिक्षकों के उदासीन रवैये से तो नही बनी है। जिले में दर्जनों ऐसे स्कूल हैं, जहां की दर्ज संख्या 20 से कम है। ऐसा नही है कि इन स्कूलों के आसपास पढ़ने वाले बच्चे नही है। पर वे सब बच्चे निजी स्कूलों में अपना भविष्य संवार रहे हैं। गुस्साए ग्रामीण बताते हैं कि शिक्षकों की लेटलतीफी और पढ़ाई न कराने के चलते ज्यादातर अभिभावकों ने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने में ही बेहतरी समझी। ग्रामीणों का कहना है कि मास्साब को बच्चों के भविष्य की कोई चिंता नहीं है। उन्हें तो सिर्फ अपने वेतन से मतलब है। चाहे स्कूूूूूूूूल में सिर्फ दो ही बच्चा पढ़ने आया हो। इस तरह शिक्षा विभाग के जिम्मेदारों की अनदेखी के चलते शासन को तो हर माह भारी चपत लग ही रही है। साथ ही गांव के बच्चों का भी शैक्षणिक व बौद्धिक विकास नहीं हो पा रहा है। वहीं पालक अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने अधिक धन राशि खर्च करना पड़ रहा है।

 

स्कूल में बच्चों की दर्ज संख्या के संबंध में हमने संकुल प्रभारी के माध्यम से जानकारी भेजा है। उच्चाधिकारीयों से कोई आदेश मिलेगा उसके अनुरूप करेगें।

 

जितेंद्र कुमार गबेल, सहायक शिक्षक

 

 

मालखरौदा ब्लाक में लगभग 4 – 5 स्कूल ऐसे है जहां की दर्ज संख्या 10 से कम है इसकी सूची मगाई जा रही है। जिसे जिला शिक्षा अधिकारी को प्रेषित कि जा रहा है आगे की कार्रवाई उच्चाधिकारी करेंगे।

मोहनलाल प्रधान, BEO मालखरौदा