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चार साल से न्याय ठंडे बस्ते में, आदिवासी ज़मीन पर अवैध सौदा, न दोषी चिन्हित न कार्रवाई

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शिकायत, निर्देश, दस्तावेज़ सब मौजूद, फिर भी नहीं हुई कार्रवाई

दोषी खुलेआम घूम रहे, पीड़ित दर-दर भटक रहा

 

शेख मुबारक@ पृथक छत्तीसगढ़/सक्ती।

न्याय अगर विलंबित हो तो वह अन्याय बन जाता है यह पंक्ति छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में आदिवासी ज़मीन पर हुए ज़मीन घोटाले में बिल्कुल सटीक बैठती है। वर्ष 2021 में दर्ज हुई गंभीर शिकायत के चार साल बाद भी आज तक न तो दोषियों पर कार्रवाई हुई और न ही पीड़ित को न्याय मिला। मामला आदिवासी ज़मीन की अवैध खरीद-बिक्री से जुड़ा है, जिसे तमाम सरकारी दस्तावेज़ों और शिकायतों के बावजूद जानबूझकर दबा दिए जाने का आरोप लग रहा है।

कैसे हुआ ज़मीन घोटाला..?

जानकारी के अनुसार, वर्ष 2018 में एक सामान्य वर्ग के व्यक्ति ने आदिवासी (गोंड जनजाति) की कृषि भूमि 3 लाख 8 हज़ार 500 रुपए में खरीद ली। रजिस्ट्री में जाति को छुपा लिया गया, आधार कार्ड और पटवारी अभिलेखों में भी फर्जीवाड़ा कर गोंड जाति दर्शा दी गई। यहीं से शुरू होता है एक योजनाबद्ध साजिश का सिलसिला, जहां सरकारी सिस्टम का इस्तेमाल कर आदिवासीयो के अधिकारों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई गईं।
शिकायतकर्ता मनोज अग्रवाल ने 2021 में इस गंभीर मामले को उजागर किया और स्पष्ट दस्तावेज़ों के साथ शिकायत दर्ज करवाई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अनुसूचित जनजाति आयोग ने 2024 में जिला प्रशासन को पत्र भेजकर जांच और कार्रवाई के स्पष्ट निर्देश दिए। लेकिन आज तक न जांच पूरी हुई, न ही दोषियों पर कोई कार्रवाई।

 

सिस्टम की चुप्पी या मिलीभगत..?

इतनी गंभीर शिकायत, आयोग का संज्ञान, और स्पष्ट दस्तावेज़ होने के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है। क्या ज़िले का प्रशासन प्रभावशाली लोगों के दबाव में है..? आदिवासी अधिकारों की रक्षा की ज़िम्मेदारी किसकी है, जब राज्य की संस्थाएं भी चुप हैं..? वहीं दोषी खुलेआम घूम रहे हैं, लेकिन पीड़ित को आज तक एक जवाब तक नहीं मिला।

शिकायतकर्ता का आरोप “प्रशासन जानबूझकर दबा रहा है मामला”

मनोज अग्रवाल का कहना है कि चार सालों से प्रशासनिक कार्यालयों में दस्तक दे रहा हूं, आयोग का पत्र भी अधिकारियों को दिया, लेकिन जानबूझकर मामले को खींचा जा रहा है। ये सिर्फ ज़मीन की बात नहीं, यह संविधान में आदिवासियों को मिले संरक्षण के खिलाफ सीधा हमला है। उन्होंने यह भी बताया कि रजिस्ट्री, आधार कार्ड और जाति प्रमाण पत्र में भारी हेरफेर कर खरीदी की गई ज़मीन आज भी अवैध कब्जे में है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है।

 

यह सिर्फ एक मामला नहीं, सक्ती में है ट्रेंड..?

छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में आदिवासी ज़मीनों पर अवैध कब्जे और खरीद-फरोख्त की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। क़ानून के मुताबिक अनुसूचित जनजातियों की भूमि किसी गैर-जनजातीय को नहीं बेची जा सकती। लेकिन प्रशासनिक मिलीभगत, फर्जी दस्तावेज़, और राजनैतिक संरक्षण के कारण ये कानून महज काग़ज़ी बनकर रह गए हैं।

 

ज़िला प्रशासन की भूमिका भी सवालों में..?

आयोग द्वारा पत्र भेजे जाने के बावजूद चार महीने से अधिक समय बीत चुका है और ज़िला प्रशासन की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। सवाल उठता है कि जब आयोग के निर्देशों की भी अनदेखी की जा रही है, तो फिर पीड़ित किससे उम्मीद करे..? वहीं अब जनता के मन में सवाल उठना लाजमी है कि क्या सरकार इस मामले में दोषियों पर नकेल कसेगी या फिर सक्ती में एक और आदिवासी अधिकार ताक पर चढ़ा दिया जाएगा..? सरकार और प्रशासन की निष्क्रियता ने इस मामले को एक उदाहरण बना दिया है कि कैसे एक आदिवासी परिवार से उनकी ज़मीन छीनी जा सकती है, और सिस्टम केवल मुकदर्शक बना रह सकता है।

 

यह देखना अब बेहद अहम है कि क्या शासन-प्रशासन इस मामले को दबाने की बजाए खुलकर जांच करेगा, दोषियों को सजा दिलाएगा और आदिवासी हितों की रक्षा करेगा, या फिर यह मामला भी सिसकती फाइलों की भीड़ में खो जाएगा।