सरपंच – ठेकेदार गठजोड़ से निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल
शेख मुबारक
पृथक छत्तीसगढ़/सक्ती।
ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपये की राशि खर्च कर रही है। सड़क, नाली, भवन, सीसी रोड सहित अन्य बुनियादी सुविधाओं के निर्माण के लिए पंचायतों को निर्माण एजेंसी बनाया जाता है, ताकि गांवों में विकास कार्य स्थानीय स्तर पर पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ पूरे किए जा सकें। लेकिन जिले के अधिकतर ग्राम पंचायतों में इसके उलट ठेका प्रथा हावी है।
सूत्रों के अनुसार, ग्राम पंचायतों के माध्यम से कराए जाने वाले अधिकतर निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी कथित तौर पर प्रभावशाली ठेकेदारों को सौंप दी जाती है। पंचायत प्रतिनिधियों और ठेकेदारों के बीच कथित सांठगांठ के चलते निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर अपेक्षित निगरानी नहीं हो पाती। सरकारी राशि से होने वाले निर्माण कार्यों में गुणवत्ता, मापदंड और तकनीकी मानकों के बजाय कम लागत में अधिक मुनाफा कमाने का खेल चलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

ठेका प्रथा का सबसे बड़ा असर निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर पड़ रहा है। घटिया सामग्री का इस्तेमाल, निर्धारित मानकों की अनदेखी और तकनीकी निगरानी में लापरवाही के कारण लाखों रुपये की लागत से तैयार निर्माण कार्य चंद दिनों या पहली बारिश में ही क्षतिग्रस्त होने लगते हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिस विकास कार्य के लिए सरकार लाखों रुपये खर्च कर रही है, वह जनता को लंबे समय तक सुविधा देने के बजाय इतनी जल्दी जवाबदेह क्यों हो रहा है..?
सबसे गंभीर सवाल यह है कि जब ग्राम पंचायतों को निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी दी गई है, तो आखिर इन कार्यों का नियंत्रण प्रभावशाली ठेकेदारों तक कैसे पहुंच रहा है..? क्या पंचायत अब ठेका प्रथा में चल रहा है..? क्या संबंधित विभाग के अधिकारियों और तकनीकी अमले को इसकी जानकारी नहीं है..? और यदि जानकारी है, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं होती..?
क्योंकि मामला केवल जर्जर भवन टूटती सड़क या बहती नाली का नहीं है, बल्कि यह सरकारी धन, पंचायत व्यवस्था और गांवों के विकास से जुड़ा गंभीर सवाल है। यदि ठेका प्रथा के कारण पंचायतों की भूमिका केवल कागजों तक सीमित हो रही है और वास्तविक निर्माण कार्य प्रभावशाली लोगों के हाथों में जा रहा है, तो यह व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल है।
ग्राम कचंदा में पहली बारिश में बह गई नाली
ग्राम पंचायत कचंदा में डीएमएफ मद से दो नाली निर्माण के लिए करीब 10 -10 लाख राशि स्वीकृत की गई थी। सुत्रों के अनुसार इस दोनों नाली निर्माण कार्य का ठेका सरपंच ने एक पूर्व जनपद उपाध्यक्ष को दी। यहां ठेका प्रथा के चलते निर्माण में गुणवत्ता के मानकों की जमकर अनदेखी की गई। नतीजा यह हुआ कि चंद दिनों पहले बनी नाली पहली बारिश भी नहीं झेल सकी। जगह-जगह नाली टूटकर बिखर गई और निर्माण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। खबर प्रकाशन के बाद जिला पंचायत सीईओ ने मौके का निरीक्षण किया। इसके बाद सरपंच, सचिव और तकनीकी सहायक पर कार्रवाई की गई।
ग्राम पंचायतों में विकास कार्य या कमीशन का खेल..?
ग्राम पंचायत कचंदा से मामले सामने आने के बाद सवाल सिर्फ एक पंचायतों तक सीमित नहीं रह जाता। सवाल यह है कि जब ग्राम पंचायतों को निर्माण एजेंसी बनाया गया है, तो आखिर ठेकेदारों की भूमिका इतनी प्रभावी कैसे हो रही है..? क्या पंचायत प्रतिनिधि वास्तव में निर्माण कार्यों की निगरानी कर रहे हैं या फिर कमीशन और अधिक कमाई के लालच में काम ठेकेदारों के हवाले किया जा रहा है..? अगर निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी समय पर होती, तो पीसौद की सड़क को दोबारा बनाने और कचंदा की नाली के टूटने की नौबत क्यों आती..?
जांच सिर्फ कार्रवाई तक नहीं, व्यवस्था तक पहुंचे
जिले के पंचायतों में होने वाले निर्माण कार्यों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। जरूरत है कि केवल शिकायत सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय सभी पंचायतों में चल रहे निर्माण कार्यों का स्वतंत्र और तकनीकी ऑडिट कराया जाए। सवाल बड़ा है – सरकारी राशि से गांवों का विकास होना है या ठेका प्रथा के जरिए कुछ लोगों की कमाई बढ़नी है..?


