जैजैपुर सबस्टेशन की लापरवाही बनी 20 गांवों की रोज़मर्रा की सजा
जनप्रतिनिधियों का आश्वासन भी हुआ बेअसर
पृथक छत्तीसगढ़/जैजैपुर।
जैजैपुर सबस्टेशन अंतर्गत ओड़ेंकेरा और तुषार फीडर से जुड़े हजारों ग्रामीण उपभोक्ताओं की ज़िंदगी इन दिनों अंधेरे और असहनीय गर्मी के बीच झुलस रही है। मौसम कोई भी हो कृ गर्मी, बारिश या हल्की हवा कृ इन दोनों फीडरों में बिजली कटौती अब नियम नहीं, मजबूरी बन गई है। बिजली विभाग की गैरजिम्मेदाराना कार्यशैली, स्थानीय जनप्रतिनिधियों की निष्क्रियता और बार-बार दिए गए ‘कार्रवाई के आश्वासन’ आज सिर्फ कागजों तक सीमित रह गए हैं।
हर दिन बिजली गुल, हर शिकायत पर चुप्पी
इन दोनों फीडरों से जुड़े 15 से 20 गांवों में रोज़ाना घंटों की बिजली कटौती ने लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। विभागीय अधिकारी न तो समय पर सुधार कार्य करते हैं और न ही कोई पूर्व सूचना देते हैं। उपभोक्ता फोन पर घण्टों तक बिजली चालू होने की भीख मांगते हैं, और कर्मचारी बहाने पर बहाना बनाते हैं।

हल्की हवा, बारिश और अघोषित ब्लैकआउट
ऐसा प्रतीत होता है कि जैजैपुर सबस्टेशन की बिजली व्यवस्था कबाड़ से बनी है। हल्की हवा चलती है तो 4-5 घंटे बिजली बंद। थोड़ी बारिश हो जाए तो पूरी रात अंधेरे में गुजरती है। उमस भरी गर्मी में बिजली कटौती से बुजुर्ग, बीमार और बच्चों की हालत बिगड़ रही है। यदि किसी जिले में बिजली कटौती प्रतियोगिता करवाई जाए, तो जैजैपुर सबस्टेशन को पहला और ओड़ेंकेरा व तुषार फीडर को दूसरा स्थान मिलना तय है। यह कटाक्ष नहीं, ग्राउंड रियलिटी है।
प्रशासन और जनप्रतिनिधि मौन, उपभोक्ता त्रस्त
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने बार-बार बिजली व्यवस्था सुधारने के नाम पर खोखले वादे किए, लेकिन नतीजा शून्य निकला। विभागीय अधिकारी पूरी तरह उदासीन हैं। ऐसे में अब आमजन के सब्र का बांध टूटने लगा है। सूत्रों के अनुसार यदि यह स्थिति बनी रही, तो जल्द ही ग्रामीण सड़क पर उतरने को मजबूर हो सकते हैं।
उमस, बीमारी और बिजली संकट, त्रिकोणीय संकट में फंसा गांव
बारिश के बाद उमस से लोग पहले ही बेहाल हैं, ऊपर से बिजली कटौती ने बीमारियों का खतरा और बढ़ा दिया है। कई ग्रामीणों की तबीयत बिगड़ने की खबरें आ रही हैं, खासकर बुजुर्गों और छोटे बच्चों की। जैज्ैपुर बिजली विभाग की व्यवस्था अब एक फेल सिस्टम बन चुकी है, जिसका खामियाज़ा हर रोज़ हजारों ग्रामीण भुगत रहे हैं।
जल्द सुधार नहीं हुआ, तो यह संकट प्रशासन के लिए बड़ा जन आंदोलन भी बन सकता है। यह कोई एक दिन की परेशानी नहीं, यह एक दशक पुरानी पीड़ा है, जिसे अब अनदेखा करना नामुमकिन है।




