शेख मुबारक
पृथक छत्तीसगढ़/सक्ती।
एक तरफ पुलिस उठा रही है आबकारी एक्ट की मशाल, तो दूसरी ओर आबकारी विभाग कर रहा है गहरी निद्रा में आराम! सवाल उठता है – कि आखिर अवैध शराब के कारोबार पर कार्रवाई करने आबकारी विभाग की चुप्पी क्यों? जवाब सीधा नहीं, पर संकेत बहुत कुछ कहते हैं…”
जिला स्तर पर पुलिस विभाग इन दिनों आबकारी एक्ट में जमकर कार्रवाई कर रहा है। अलग-अलग थाना क्षेत्रों में शराब माफियाओं की धरपकड़ जारी है – छापेमारी, गिरफ्तारियां और जेल भेजने का सिलसिला तेज़ है।

लेकिन वहीं दूसरी तरफ…
सक्ती, जैजैपुर और बाराद्वार के आबकारी विभाग की सक्रियता पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। इन इलाकों में आबकारी निरीक्षक हैं तो सही, लेकिन नजर नहीं आते। और जब आते हैं… तो कार्रवाई नहीं, सेटिंग की खबरें सामने आती हैं।
🔍 सूत्रों की मानें तो इन इलाकों के आबकारी अधिकारी केवल उन्हीं जगहों पर ‘कदम रखते हैं’ जहां पहले से सब साफ़-सुथरा हो। और जहां अवैध शराब के गोदाम हों, वहां या तो ‘नज़रअंदाज़’ किया जाता है या फिर ‘मामला सुलटा’ दिया जाता है।
👥 स्थानीय लोगों का कहना है कि क्षेत्र में खुलेआम अवैध शराब का कारोबार फल-फूल रहा है। मोहल्लों से लेकर हाईवे किनारे तक – शराब की अवैध बिक्री का जाल फैला हुआ है। लेकिन हैरानी की बात ये है कि यहां आबकारी विभाग की छापेमारी की कोई ख़बर नहीं आती।
🎯 सवाल ये है कि क्या पुलिस को ही अब आबकारी विभाग का काम करना पड़ेगा? क्या आबकारी अधिकारी केवल कागज़ी खानापूर्ति के लिए नियुक्त हैं? या फिर ये पूरा सिस्टम ‘अंदर से सेट’ है?
⚠️ इस ढिलाई का फायदा उठा रहे हैं शराब माफिया, जिन्हें अब ये यकीन हो चला है कि “पुलिस तो पकड़ सकती है, लेकिन आबकारी विभाग से हमें कोई डर नहीं।”
📢 अब जरूरत है एक बड़े प्रशासनिक हस्तक्षेप की, ताकि ये स्पष्ट हो सके कि क्या विभागीय लापरवाही है, या फिर लापरवाही की आड़ में सौदेबाज़ी का खेल..?
🛑 यदि यही हाल रहा, तो सवाल उठना लाज़िमी है –
“आख़िर आबकारी विभाग है किसके लिए? जनता के लिए या माफियाओं के लिए..?”




